البلد
The City • 20 ayahs • Meccan
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَٰنِ ٱلرَّحِيمِ
1मैं इस नगर (मक्का) की क़सम खाता हूँ!
2तथा तुम्हारे लिए इस नगर में लड़ाई हलाल होने वाली है।
3तथा क़सम है पिता तथा उसकी संतान की!
4निःसंदेह हमने मनुष्य को बड़ी कठिनाई में पैदा किया है।
5क्या वह समझता है कि उसपर कभी किसी का वश नहीं चलेगा?[1]
6वह कहता है कि मैंने ढेर सारा धन ख़र्च कर दिया।
7क्या वह समझता है कि उसे किसी ने नहीं देखा?[2]
8क्या हमने उसके लिए दो आँखें नहीं बनाईं?
9तथा एक ज़बान और दो होंठ (नहीं बनाए)?
10और हमने उसे दोनों मार्ग दिखा दिए?!
11परंतु उसने दुर्लभ घाटी में प्रवेश ही नहीं किया।
12और तुम्हें किस चीज़ ने ज्ञात कराया कि वह दुर्लभ 'घाटी' क्या है?
13(वह) गर्दन छुड़ाना है।
14या किसी भूख वाले दिन में खाना खिलाना है।
15किसी रिश्तेदार अनाथ को।
16या मिट्टी में लथड़े हुए निर्धन को।[3]
17फिर वह उन लोगों में से हो, जो ईमान लाए और एक-दूसरे को धैर्य रखने की सलाह दी और एक-दूसरे को दया करने की सलाह दी।
18यही लोग दाहिने हाथ वाले (सौभाग्यशाली) हैं।
19और जिन लोगों ने हमारी आयतों का इनकार किया, वही लोग बाएँ हाथ वाले (दुर्भाग्यशाली) हैं।
20उनपर (हर ओर से) बंद की हुई आग होगी।