الشعراء
The Poets • 227 ayahs • Meccan
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَٰنِ ٱلرَّحِيمِ
1ता, सीन, मीम।
2ये स्पष्ट किताब की आयतें हैं।
3शायद (ऐ रसूल!) आप अपने आपको हलाक करने वाले हैं, इसलिए कि वे ईमान नहीं लाते।[1]
4यदि हम चाहें, तो उनपर आकाश से कोई निशानी उतार दें, फिर उसके सामने उनकी गर्दनें झुकी रह जाएँ।[2]
5और जब भी 'रह़मान' (अति दयावान्) की ओर से उनके पास कोई नई नसीहत आती है, तो वे उससे मुँह फेरने वाले होते हैं।
6अतः निःसंदेह उन्होंने झुठला दिया, तो शीघ्र ही उनके पास उस चीज़ की खबरें आ जाएँगी, जिसका वे उपहास उड़ाया करते थे।
7और क्या उन्होंने धरती की ओर नहीं देखा कि हमने उसमें हर उत्तम प्रकार के कितने पौधे उगाए हैं?
8निःसंदे इसमें निश्चय एक बड़ी निशानी[3] है। (परंतु) उनमें से अधिकतर ईमान लाने वाले नहीं थे।
9तथा निःसंदेह आपका पालनहार, निश्चय वही सबपर प्रभुत्वशाली, अत्यंत दयावान् है।
10और जब आपके पालनहार ने मूसा को पुकारा कि उन ज़ालिम लोगों[4] के पास जाओ।
11फ़िरऔन की जाति के पास। क्या वे डरते नहीं?
12उसने कहा : ऐ मेरे पालनहार! निःसंदेह मुझे डर है कि वे मुझे झुठला देंगे।
13और मेरा सीना घुटता है और मेरी ज़बान नहीं चलती, अतः हारून की ओर संदेश भेज।
14और उनका मुझपर एक अपराध का आरोप है। अतः मैं डरता हूँ कि वे मुझे मार डालेंगे।
15(अल्लाह ने) फरमाया : ऐसा कभी नहीं होगा, अतः तुम दोनों हमारी निशानियों के साथ जाओ। निःसंदेह हम तुम्हारे साथ ख़ूब सुनने[5] वाले हैं।
16तो तुम दोनों फ़िरऔन के पास जाओ और कहो कि निःसंदेह हम सारे संसारों के पालनहार के संदेशवाहक हैं।
17कि तू बनी इसराईल को हमारे साथ भेज दे।
18(फ़िरऔन ने) कहा : क्या हमने तुझे अपने यहाँ इस हाल में नहीं पाला कि तू बच्चा था और तू हमारे बीच अपनी आयु के कई वर्ष रहा?
19और तूने अपना वह काम[6] किया, जो तूने किया। और तू अकृतज्ञों में से है।
20(मूसा ने) कहा : मैंने उस समय वह काम इस हाल में किया कि मैं अनजानों में से था।
21फिर मैं तुम्हारे पास से भाग गया, जब मैं तुमसे डरा, तो मेरे पालनहार ने मुझे हुक्म (नुबुव्वत एवं ज्ञान) प्रदान किया और मुझे रसूलों में से बना दिया।
22और यह कोई उपकार है, जो तू मुझपर जता रहा है कि तूने बनी इसराईल काे ग़ुलाम बना रखा है।
23फ़िरऔन ने कहा : और 'रब्बुल-आलमीन' (सारे संसारों का पालनहार) क्या है?
24(मूसा ने) कहा : जो आकाशों और धरती का रब है और जो उनके बीच है उसका भी, यदि तुम विश्वास करने वाले हो।
25उसने अपने आस-पास के लोगों से कहा : क्या तुम सुनते नहीं?
26(मूसा ने) कहा : जो तुम्हारा पालनहार तथा तुम्हारे पहले बाप-दादा का पालनहार है।
27(फ़िरऔन ने) कहा : निश्चय तुम्हारा यह रसूल, जो तुम्हारी ओर भेजा गया है, अवश्य पागल है।
28(मूसा ने) कहा : जो पूर्व तथा पश्चिम रब है और उसका भी जो उन दोनों के बीच है, अगर तुम समझते हो।
29(फ़िरऔन ने) कहा : निश्चय यदि तूने मेरे अलावा किसी और को पूज्य बनाया, तो मैं तुझे अवश्य ही बंदी बनाए हुए लोगों में शामिल कर दूँगा।
30(मूसा ने) कहा : क्या भले ही मैं तेरे पास कोई स्पष्ट चीज़ ले आऊँ?
31उसने कहा : तू उसे ले आ, यदि तू सच्चे लोगों में से है।
32फिर उसने अपनी लाठी फेंक दी, तो अचानक वह एक प्रत्यक्ष अजगर बन गई।
33तथा उसने अपना हाथ निकाला, तो एकाएक वह देखने वालों के लिए सफेद (चमकदार) था।
34उसने अपने आस-पास के प्रमुखों से कहा : निश्चय यह तो एक बड़ा कुशल जादूगर है।
35जो चाहता है कि अपने जादू के साथ तुम्हें तुम्हारी धरती से निकाल[7] दे। तो तुम क्या आदेश देते हो?
36उन्होंने कहा : इसके तथा इसके भाई को मोहलत दें और नगरों में (लोगों को) जमा करने वालों को भेज दें।
37कि वे तेरे पास हर बड़ा जादूगर ले आएँ, जो जादू में बहुत कुशल हो।
38तो जादूगर एक निश्चित दिन के नियत समय पर इकट्ठा कर लिए गए।
39तथा लोगों से कहा गया : क्या तुम एकत्र होने वाले[8] हो?
40शायद हम इन जादूगरों के अनुयायी बन जाएँ, यदि वही विजयी हों।
41फिर जब जादूगर आ गए, तो उन्होंने फ़िरऔन से कहा : क्या सचमुच हमें कुछ पुरस्कार मिलेगा, यदि हम ही प्रभावी रहे?
42उसने कहा : हाँ! और निश्चय तुम उस समय निकटवर्तियों में से हो जाओगे ।
43मूसा ने उनसे कहा : फेंको, जो कुछ तुम फेंकने वाले हो।
44तो उन्होंने अपनी रस्सियाँ और लाठियाँ फेंकीं और कहा : फ़िरऔन के प्रभुत्व की सौगंध! निःसंदेह हम, निश्चय हम ही विजयी रहेंगे।
45फिर मूसा ने अपनी लाठी फेंकी, तो एकाएक वह उन चीज़ों को निगल रही थी, जो वे झूठ बना रहे थे।
46इसपर जादूगर सजदा करते हुए गिर गए।[9]
47उन्होंने कहा : हम सारे संसारों के पालनहार पर ईमान ले आए।
48मूसा तथा हारून के पालनहार पर।
49(फ़िरऔन ने) कहा : तुम उसपर ईमान ले आए, इससे पहले कि मैं तुम्हें अनुमति दूँ? निःसंदेह यह अवश्य तुम्हारा बड़ा (गुरू) है, जिसने तुम्हें जादू सिखाया है। अतः निश्चय तुम जल्दी जान लोगे। मैं अवश्य तुम्हारे हाथ और तुम्हारे पाँव विपरीत दिशा[10] से काट दूँगा तथा निश्चय तुम सभी को अवश्य बुरी तरह सूली पर चढ़ा दूँगा।
50उन्होंने कहा : कोई नुक़सान नहीं, निश्चित रूप से हम अपने पालनहार की ओर पलटने वाले हैं।
51हम आशा रखते हैं कि हमारा पालनहार हमारे लिए, हमारे पापों को क्षमा कर देगा, इस कारण कि हम सबसे पहले ईमान लाने वाले हैं।
52और हमने मूसा की ओर वह़्य की कि मेरे बंदों को लेकर रातों-रात निकल जा। निश्चय ही तुम्हारा पीछा किया जाएगा।
53तो फ़िरऔन ने नगरों में (सेना) एकत्र करने वालों को भेज दिया।[11]
54कि निःसंदेह ये लोग एक छोटा-सा समूह हैं।
55और निःसंदेह ये हमें निश्चित रूप से गुस्सा दिलाने वाले हैं।
56और निश्चय ही हम सब चौकन्ना रहने वाले हैं।
57इस तरह हमने उन्हें बाग़ों और सोतों से निकाल दिया।
58तथा ख़ज़ानों और उत्तम आवासों से।
59ऐसा ही हुआ और हमने उनका वारिस बनी इसराईल को बना दिया।
60तो उन्होंने सूर्योदय के समय उनका पीछा किया।
61फिर जब दोनों गिरोहों ने एक-दूसरे को देखा, तो मूसा के साथियों ने कहा : निःसंदेह हम निश्चय ही पकड़े जाने[12] वाले हैं।
62(मूसा ने) कहा : हरगिज़ नहीं! निश्चय मेरे साथ मेरा पालनहार है। वह अवश्य मेरा मार्गदर्शन करेगा।
63तो हमने मूसा की ओर वह़्य की कि अपनी लाठी को सागर पर मारो। (उसने लाठी मारी) तो वह फट गया और हर टुकड़ा बड़े पहाड़ की[13] तरह हो गया।
64तथा वहीं हम दूसरों को निकट ले आए।
65और हमने मूसा को और जो उसके साथ थे, सबको बचा लिया।
66फिर हमने दूसरों को डुबो दिया।
67निःसंदेह इसमें निश्चय एक बड़ी निशानी है। और उनमें से अधिकतर लोग ईमान लाने वाले नहीं थे।
68और निःसंदेह आपका पालनहार, निश्चय वही सबपर प्रभुत्वशाली, अत्यंत दयावान् हैl
69तथा आप उन्हें इबराहीम का समाचार सुनाएँ।
70जब उसने अपने बाप तथा अपनी जाति से कहा : तुम किसकी पूजा करते हो?
71उन्होंने कहा : हम कुछ मूर्तियों की पूजा करते हैं, इसलिए उन्हीं की सेवा में लगे रहते हैं।
72उसने कहा : क्या वे तुम्हें सुनते हैं, जब तुम (उन्हें) पुकारते हो?
73या तुम्हें लाभ देते हैं, या हानि पहुँचाते हैं?
74उन्होंने कहा : बल्कि हमने अपने बाप-दादा को पाया कि वे ऐसा ही करते थे।
75उसने कहा : तो क्या तुमने देखा कि जिनको तुम पूजते रहे।
76तुम तथा तुम्हारे पहले बाप-दादा?
77सो निःसंदेह वे मेरे शत्रु हैं, सिवाय सारे संसारों के पालनहार के।
78वह जिसने मुझे पैदा किया, फिर वही मेरा मार्गदर्शन करता है।
79और वही जो मुझे खिलाता है और मुझे पिलाता है।
80और जब मैं बीमार होता हूँ, तो वही मुझे अच्छा करता है।
81तथा वह जो मुझे मारेगा, फिर[14] मुझे जीवित करेगा।
82तथा वह, जिससे मैं आशा रखता हूँ कि वह बदले के दिन मेरे पाप क्षमा कर देगा।
83ऐ मेरे पालनहार! मुझे हुक्म (धर्म का ज्ञान) प्रदान कर और मुझे नेक लोगों के साथ मिला।
84और बाद में आने वालों में मुझे सच्ची ख्याति प्रदान कर।
85और मुझे नेमतों वाली जन्नत के वारिसों में से बना दे।
86तथा मेरे बाप को क्षमा कर दे।[15] निश्चय वह गुमराहों में से था।
87तथा मुझे रुसवा न कर, जिस दिन लोग उठाए जाएँगे।[16]
88जिस दिन न कोई धन लाभ देगा और न बेटे।
89परंतु जो अल्लाह के पास पाक-साफ़ दिल लेकर आया।
90और (अपने रब से) डरने वालों के लिए जन्नत निकट लाई जाएगी।
91तथा पथभ्रष्ट लोगों के लिए भड़कती आग प्रकट कर दी जाएगी।
92तथा उनसे कहा जाएगा : कहाँ हैं वे, जिन्हें तुम पूजते थे?
93अल्लाह के सिवा। क्या वे तुम्हारी मदद करते हैं, या अपनी रक्षा करते हैं?
94फिर वे और सब पथभ्रष्ट लोग उसमें औंधे मुँह फेंक दिए जाएँगे।
95और इबलीस की समस्त सेनाएँ भी।
96वे उसमें आपस में झगड़ते हुए कहेंगे :
97अल्लाह की क़सम! निःसंदेह हम निश्चय खुली गुमराही में थे।
98जब हम तुम्हें सारे संसारों के पालनहार के बराबर ठहराते थे।
99और हमें तो सिर्फ़ इन अपराधियों ने गुमराह किया।
100अब न हमारे लिए कोई सिफारिश करने वाले हैं।
101और न कोई घनिष्ट मित्र।
102तो यदि वास्तव में हमारे लिए वापस जाने का अवसर होता, तो हम ईमानवालों में से हो जाते।[17]
103निःसंदेह इसमें निश्चय एक बड़ी निशानी है। और उनमें से अधिकतर ईमानवाले नहीं थे।
104और निःसंदेह आपका पालनहार, निश्चय वही सबपर प्रभुत्वशाली,[18] अत्यंत दयावान् हैl
105नूह़ की जाति ने रसूलों को झुठलाया।
106जब उनसे उनके भाई नूह़ ने कहा : क्या तुम डरते नहीं?
107निःसंदेह मैं तुम्हारे लिए एक अमानतदार रसूल हूँ।[19]
108अतः तुम अल्लाह से डरो और मेरी बात मानो।
109मैं इस (कार्य) पर तुमसे कोई पारिश्रमिक (बदला) नहीं माँगता। मेरा बदला तो केवल सारे संसारों के पालनहार पर है।
110अतः तुम अल्लाह से डरो और मेरी बात मानो।
111उन्होंने कहा : क्या हम तुझपर ईमान ले आएँ, जबकि तेरे पीछे चलने वाले अत्यंत नीच[20] लोग हैं?
112(नूह़ ने) कहा : मूझे क्या मालूम कि वे क्या कर्म करते रहे हैं?
113उनका ह़िसाब तो मेरे पालनहार ही के ज़िम्मे है, यदि तुम समझो।
114और मैं ईमान वालों को धुतकारने वाला[21] नहीं हूँ।
115मैं तो बस एक खुला डराने वाला हूँ
116उन्होंने कहा : ऐ नूह़! यदि तू बाज़ नहीं आया, तो अवश्य संगसार किए गए लोगों में से हो जाएगा।
117उसने कहा : ऐ मेरे पालनहार! निःसंदेह मेरी जाति ने मुझे झुठला दिया!
118अतः तू मेरे और उनके बीच दो-टूक निर्णय कर दे, तथा मुझे और जो ईमानवाले मेरे साथ हैं, उन्हें बचा ले।
119तो हमने उसे और उन लोगों को जो उसके साथ भरी हुई नाव में थे, बचा लिया।
120फिर उसके बाद शेष लोगों को डुबो दिया।
121निःसंदेह इसमें निश्चय एक बड़ी निशानी है। और उनमें से अधिकतर ईमानवाले नहीं थे।
122और निःसंदेह आपका पालनहार, निश्चय वही सबपर प्रभुत्वशाली, अत्यंत दयावान् है।
123आद ने रसूलों को झुठलाया।
124जब उनसे उनके भाई हूद[22] ने कहा : क्या तुम डरते नहीं हो?
125निःसंदेह मैं तुम्हारे लिए एक अमानतदार रसूल हूँ।
126अतः तुम अल्लाह से डरो और मेरी बात मानो।
127मैं इस (कार्य) पर तुमसे कोई पारिश्रमिक (बदला) नहीं माँगता, मेरा बदला तो केवल सारे संसारों के पालनहार पर है।
128क्या तुम हर ऊँचे स्थान पर एक स्मारक बनाते हो? इस स्थिति में कि व्यर्थ कार्य करते हो।
129तथा बड़े-बड़े भवन बनाते हो, शायद कि तुम सदा जीवित रहोगे।
130और जब तुम पकड़ते हो, तो बड़ी निर्दयता से पकड़ते हो।
131अतः अल्लाह से डरो और जो मैं कहता हूँ, उसे मानो।
132तथा उससे डरो जिसने उन चीज़ों से तुम्हारी मदद की, जिन्हें तुम जानते हो।
133उसने चौपायों और बेटों से तुम्हारी मदद की।
134तथा बाग़ों और जल स्रोताें से।
135निश्चय ही मैं तुमपर एक बड़े दिन की यातना से डरता हूँ।
136उन्होंने कहा : हमारे लिए बराबर है कि तू नसीहत करे, या नसीहत करने वालों में से हो।
137यह तो केवल पहले लोगों की आदत है।[23]
138और हम निश्चित रूप से दंडित नहीं होंगे।
139तो उन्होंने उसे झुठला दिया, तो हमने उन्हें विनष्ट कर दिया। निःसंदेह इसमें निश्चय एक बड़ी निशानी है। और उनमें से अधिकतर लोग ईमानवाले नहीं थे।
140तथा निःसंदेह आपका पालनहार, निश्चय वही सबपर प्रभुत्वशाली, अत्यंत दयावान् है।
141समूद ने रसूलों[24] को झुठलाया।
142जब उनसे उनके भाई सालेह़ ने कहा : क्या तुम डरते नहीं हो?
143निःसंदेह मैं तुम्हारे लिए एक अमानतदार रसूल हूँ।
144अतः अल्लाह से डरो और जो मैं कहता हूँ, उसका पालन करो।
145मैं इसपर तुमसे कोई पारिश्रमिक (बदला) नहीं माँगता। मेरा बदला तो केवल सारे संसारों के पालनहार पर है।
146क्या तुम उन चीज़ों में जो यहाँ हैं, निश्चिंत छोड़ दिए जाओगे?
147बाग़ों तथा स्रोतों में।
148तथा खेतों और खजूर के पेड़ों में, जिनके फल मुलायम और पके हुए हैं।
149तथा तुम पर्वतों को काटकर बड़ी निपुणता के साथ घर बनाते हो।
150अतः अल्लाह से डरो और मेरा आज्ञापालन करो।
151और हद से आगे बढ़ने वालों का हुक्म न मानो।
152जो धरती में बिगाड़ पैदा करते हैं और सुधार नहीं करते।
153उन्होंने कहा : निःसंदेह तू उन लोगों में से है जिनपर प्रबल जादू किया गया है।
154तू तो बस हमारे ही जैसा एक मनुष्य है। अतः कोई निशानी ले आ, यदि तू सच्चों में से है।
155उसने कहा : यह एक ऊँटनी[25] है। इसके लिए पानी पीने की एक बारी है और तुम्हारे लिए एक निश्चित दिन पानी पीने की बारी है।
156तथा उसे किसी बुराई से हाथ न लगाना, अन्यथा तुम्हें एक बड़े दिन की यातना पकड़ लेगी।
157तो उन्होंने उसकी कूँचें काट दीं, फिर पछताने वाले हो गए।
158तो उन्हें यातना ने पकड़ लिया। निःसंदेह इसमें निश्चय एक बड़ी निशानी है। और उनमें से अधिकतर ईमानवाले नहीं थे।
159और निःसंदेह आपका पालनहार, निश्चय वही सबपर प्रभुत्वशाली, अत्यंत दयावान् है।
160लूत की जाति ने रसूलों को झुठलाया।
161जब उनके भाई लूत ने उनसे कहा : क्या तुम डरते नहीं हो?
162निःसंदेह मैं तुम्हारे लिए एक अमानतदार रसूल हूँ।
163अतः तुम अल्लाह से डरो और मेरी बात मानो।
164मैं इस (कार्य) पर तुमसे कोई पारिश्रमिक (बदला) नहीं माँगता, मेरा बदला तो केवल सारे संसारों के पालनहार पर है।
165क्या सभी संसारों में से तुम पुरुषों के पास आते[26] हो।
166तथा उन्हें छोड़ देते हो, जो तुम्हारे पालनहार ने तुम्हारे लिए तुम्हारी पत्नियाँ पैदा की हैं। बल्कि तुम हद से आगे बढ़ने वाले लोग हो।
167उन्होंने कहा : ऐ लूत! निःसंदेह यदि तू नहीं रुका, तो निश्चित रूप से तू अवश्य निष्कासित लोगों में से हो जाएगा।
168उसने कहा : निःसंदेह मैं तुम्हारे काम से सख़्त घृणा करने वालों में से हूँ।
169ऐ मेरे पालनहार! मुझे तथा मेरे घर वालों को उससे बचा ले, जो ये करते हैं।
170तो हमने उसे और उसके सभी घर वालों को बचा लिया।
171सिवाय एक बुढ़िया[27] के, जो पीछे रहने वालों में से थी।
172फिर हमने दूसरों को विनष्ट कर दिया।
173और हमने उनपर ज़ोरदार बारिश[28] बरसाई। तो उन लोगों की बारिश बहुत बुरी थी, जिन्हें डराया गया था।
174निःसंदेह इसमें निश्चय एक बड़ी निशानी है। और उनमें से अधिकतर ईमानवाले नहीं थे।
175और निःसंदेह आपका पालनहार, निश्चय वही सबपर प्रभुत्वशाली, अत्यंत दयावान् है।
176ऐका[29] वालों ने रसूलों को झुठलाया।
177जब उनसे शुऐब ने कहा : क्या तुम डरते नहीं हो?
178निःसंदेह मैं तुम्हारे लिए एक अमानतदार रसूल हूँ।
179अतः तुम अल्लाह से डरो और मेरी बात मानो।
180मैं इस (कार्य) पर तुमसे कोई पारिश्रमिक (बदला) नहीं माँगता, मेरा बदला तो केवल सारे संसारों के पालनहार पर है।
181नाप पूरा दो और कम देने वालों में से न बनो।
182और सीधे तराज़ू से तोलो।
183और लाेगों को उनका सामान कम न दो। और धरती में उपद्रव फैलाते मत फिरो।
184और उससे डरो, जिसने तुम्हें तथा पहले लोगों को पैदा किया है।
185उन्होंने कहा : निःसंदेह तू तो उन लोगों में से है जिनपर ताक़तवर जादू किया गया है।
186और तू तो बस हमारे ही जैसा एक मनुष्य[30] है और निःसंदेह हम तो तुझे झूठों में से समझते हैं।
187तो हम पर आसमान से कुछ टुकड़े गिरा दे, यदि तू सच्चों में से है।
188उसने कहा : मेरा पालनहार अधिक जानने वाला है जो कुछ तुम कर रहे हो।
189चुनाँचे उन्होंने उसे झुठला दिया। तो उन्हें छाया[31] के दिन की यातना ने पकड़ लिया। निश्चय वह एक बड़े दिन की यातना थी।
190निःसंदेह इसमें निश्चय एक बड़ी निशानी है। और उनमें से अधिकतर ईमानवाले नहीं थे।
191और निःसंदेह आपका पालनहार, निश्चय वही सबपर प्रभुत्वशाली, अत्यंत दयावान् है।
192तथा निःसंदेह, यह (क़ुरआन) निश्चय सारे संसारों के पालनहार का उतारा हुआ है।
193इसे रूह़ुल-अमीन[32] (अत्यंत विश्वसनीय फ़रिश्ता) लेकर उतरा है।
194आपके दिल पर, ताकि आप सावधान करने वालों में से हो जाएँ।
195स्पष्ट अरबी भाषा में।
196तथा निःसंदेह यह निश्चित रूप से पहले लोगों की पुस्तकों में मौजूद है।[33]
197क्या उनके लिए यह एक निशानी न थी है कि इसे बनी इसराईल के विद्वान[34] जानते हैं।
198और यदि हम इसे ग़ैर-अरब[35] लोगों में से किसी पर उतार देते।
199फिर वह इसे उनके सामने पढ़ता, तो भी वे उसपर ईमान लाने वाले न होते।[36]
200इसी प्रकार हमने इसे अपराधियों के हृदयों में प्रवेश कर दिया।
201वे उसपर ईमान नहीं लाएँगे, यहाँ तक कि वे दर्दनाक यातना देख लें।
202तो वह उनपर अचानक आ पड़े और वे सोचते भी न हों।
203फिर वे कहें : क्या हम मोहलत दिए जाने वाले हैं
204तो क्या वे हमारी यातना के लिए जल्दी मचा रहे हैं?
205तो क्या आपने विचार किया यदि हम इन्हें कुछ वर्षों तक लाभ दें।
206फिर उनपर वह (यातना) आ जाए, जिसका उनसे वादा किया जाता था।
207तो उन्हें जो लाभ दिया जाता था, वह उनके किस काम आएगा?
208और हमने किसी बस्ती को विनष्ट नहीं किया, परंतु उसके लिए कई सावधान करने वाले थे।
209याद दिलाने के लिए। और हम अत्याचारी नहीं थे।
210तथा इस (क़ुरआन) को लेकर शैतान नहीं उतरे।
211और न यह उनके योग्य है, और न वे ऐसा कर सकते हैं।
212निःसंदेह वे तो (इसके) सुनने ही से अलग[37] कर दिए गए हैं।
213अतः आप अल्लाह के साथ किसी अन्य पूज्य को न पुकारें, अन्यथा आप दंड पाने वालों में हो जाएँगे।
214और आप अपने निकटतम रिश्तेदारों को डराएँ।[38]
215और ईमान वालों में से जो आपका अनुसरण करे, उसके लिए अपना बाज़ू[39] झुका दें।
216फि यदि वे आपकी अवज्ञा करें, तो आप कह दें कि तुम जो कुछ कर रहे हो उसकी ज़िम्मेदारी से मैं बरी हूँ।
217तथा उस सबपर प्रभुत्वशाली, अत्यंत दयावान् पर भरोसा करें।
218जो आपको देखता है, जब आप खड़े होते हैं।
219और सजदा करने वालों में आपके फिरने को भी।[40]
220निःसंदेह वही सब कुछ सुनने वाला, सब कुछ जानने वाला है।
221क्या मैं आपको बताऊँ कि शैतान किस पर उतरते हैं?
222वे हर बड़े झूठे और बड़े पापी[41] पर उतरते हैं।
223वे सुनी हुई बात को (काहिनों तक) पहुँचा देते हैं, और उनमें से अधिकतर झूठे हैं।
224और कवि लोग, उनके पीछे भटके हुए लोग ही चलते हैं।
225क्या आपने नहीं देखा कि वे प्रत्येक वादी में भटकते फिरते[42] हैं।
226और यह कि निःसंदेह ऐसी बात कहते हैं, जो करते नहीं।
227सिवाय उन (कवियों) के, जो[43] ईमान लाए, और अच्छे कर्म किए और अल्लाह को बहुत याद किया तथा बदला लिया, इसके बाद कि उनके ऊपर ज़ुल्म किया गया। तथा वे लोग, जिन्होंने अत्याचार किया, शीघ्र ही जान लेंगे कि वे किस जगह लौटकर जाएँगे।